शायर अहले बएत इशरत रिज़वी साहब
शायर अहले बएत इशरत रिज़वी साहब ने मु. राजा अब्बास के इमाम बड़े में ( ११ फ़रवरी ७.३० बजे
८ रबी अव्वल ) अपना कलम पढ़ा :
इस दर्जः तमद्दुन का है, ज़माने में है फुक्दान,
बस अपने किये पर कोई होता है पशेमान
रखते हैं मगर म्यान में तफरीक कि तलवार
ये चाहें जहाँ जाएँ वहां आग लगा दें, उठने लगे शोले, तो उन्हें और हवा दें,
आबाद है बस ऐसे ही से लोगो से ज़माना, उन लोगो के होठो पर है नफरत का तराना
जिन लोगो का पेशा है फ़क़त आग लगाना, जो ढूँढ़ते रहते है तक़दुस का बहाना
उन लोगो कि दुनिया में बहुत आव भगत है, जिन लोगो के आमल से बदनाम जगत है.
वोह फिक्र में गर्मी वोह मिजाजों में तमाज़त, वोह लोग जो करते नहीं माँ बाप कि इज्ज़त
जो एब समझते है बुजुर्गो कि इत'अत, नुकसान उठाती है, उन्ही लोगो से मिल्लत
जो कहते है हम फर्द है हर एक हुनर में, वोह आग लगा देते है खुद अपने ही घर में
करते है बड़ी शान से बच्चों का अकीका
माँ बाप को देने के लिए माल नहीं है , हम में से कोई इस बात से खुशहाल नहीं है
रहमत ए इलाही से जो करते हैं किनारा, होता नहीं है कोई उनका दुनिया में सहारा
पवने सुखन कहता है इस्लाम हमारा, कर सकते नहीं वोह कभी जन्नत का नज़ारा.
माँ बाप को जो छोड़ गए जन कि ख़ुशी में उन लोगो के दिल टूट गए दीदा शबी में
हाँ उफ़ करना भी अच्छा नहीं होता, हां खौफ मगर हमको खुदा का नहीं होता,
इस्लाम जो पढ़ लेते तो एइय्सा नहीं होता
वोह अच्छा है दुनिया में, वोह रुसवा नहीं होता (19 )
तहजीब हमेशा सूली पे चाहेगी
माँ बाप है बच्चो के लिए सा'आये रहमत, माँ बाप की हर हाल में, वाजिब है इत'अत
वोह लोग जो माप कि करते नहीं इज्ज़त, अल्लाह भी करता नहीं उन लोगो कि नुसरत
अल्लाह कि मर्ज़ी पे जो सर ख़म नहीं होते, इन्सान तो होते है मुकर्रम नहीं होते.
अल्लाह ने माँ बाप को बख्शा है यह रुतबा. माँ बाप भी होते है शिफा'अत का ज़रीआ
मअर जाते है माँ बाप तो कर लेते हैं गिर्य, चालीसा हो जाये तो फिर कैसा फ़रीज़ा
डूबी हुई क़ब्रो से सदा देते हैं माँ बा, हम कुछ न सुने फिर भी दुआ देते है मा बाप
इशरत लखनवी साहब का कलम
मुहं देखी हुई हुयी है प्यार की बातें., किस मोड़ पर ले ई है दुनिए कि सियासत
अघरार से हमदर्दिया रिश्तों से बघवात, बैठें है हर एक मोड़ पर मग़रूर तबियत,
सर इल्म का उठने नहीं देती है जिहालत, जो झूटी सनद वाले है वोह सबसे बड़े हैं,
जो इल्म के शैदा है, वो खामोश खड़े हैं.
एइसे भी हैं कुछ दौर ए तर्रिकी के परसदार, जो फिरका परिस्ति कि उठा दें है तलवार
बातो से तो लगते हैं बड़े साहिबे किरदार . रखते हैं मगर म्यान में तफरीक कि तलवार
ये चाहें जहाँ जाएँ वहां आग लगा दें, उठने लगे शोले, तो उन्हें और हवा दें
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